– “जब शायरी ने इंसानियत का पैग़ाम दिया और न्याय ने मोहब्बत का रास्ता दिखाया” — याद-ए-साक़ी ऑल इंडिया मुशायरा बना अदब और भाईचारे की यादगार शाम
इंदौर। बज़्म-ए-साक़ी की ओर से आयोजित “याद-ए-साक़ी ऑल इंडिया मुशायरा” अदब, तहज़ीब, इंसानियत और सामाजिक सद्भाव की ऐसी ऐतिहासिक महफ़िल साबित हुआ, जिसकी गूंज देर तक शायरी प्रेमियों के दिलों में महसूस की जाती रहेगी। इंदौर से लगभग 18 किलोमीटर दूर एक होटल के सभागार में आयोजित इस भव्य मुशायरे ने यह साबित कर दिया कि उर्दू शायरी आज भी समाज को जोड़ने और मोहब्बत का पैग़ाम देने की सबसे असरदार ज़ुबान है।
भीषण गर्मी के बावजूद बड़ी संख्या में उर्दू अदब और शायरी के चाहने वाले कार्यक्रम स्थल पहुंचे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा सभागार खचाखच भर गया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि मरहूम याक़ूब साक़ी साहब के प्रति लोगों के दिलों में कितनी गहरी मोहब्बत और अकीदत मौजूद है।

मुशायरे की शुरुआत में ख़ादिम-ए-मिल्लत कमेटी के अध्यक्ष हाजी निसार साहब का स्वागत किया गया। इसके बाद मुफ़्ती सैफ़ुल्लाह अर्शी, मक़सूद नश्तरी और डॉ. अज़ीज़ इरफ़ान ने मरहूम याक़ूब साक़ी की अदबी, सामाजिक और कौमी सेवाओं को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने कहा कि साक़ी साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानियत, मोहब्बत और साहित्य की सेवा में समर्पित कर दी।
कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण एवं विशेष अतिथि जिला न्यायाधीश हिदायत उल्ला खान रहे, जिन्होंने अपने प्रभावशाली उद्बोधन और मार्मिक शायरी के माध्यम से प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि अदालतें केवल फैसले सुनाने की जगह नहीं होतीं, बल्कि टूटते रिश्तों को बचाने और समाज में अमन कायम करने का माध्यम भी होती हैं। नेशनल लोक अदालत केवल मुकदमों का निराकरण नहीं करती, बल्कि दिलों के बीच की दूरियों को भी समाप्त करती है।
अपने भावपूर्ण अंदाज़ में उन्होंने जब यह शेर पढ़ा—
“वही फ़रियाद करके राज़ीनामा,
वो सबसे फिर भलाई कर रहा है…”
तो पूरा सभागार तालियों की गूंज से गूंज उठा।
कार्यक्रम में मध्यस्थ प्रशिक्षक मोहम्मद शमीम खान ने मीडिएशन की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब शायर मोहब्बत, अमन और इंसानियत की बात करता है, तो समाज में नफ़रत की दीवारें स्वतः ढहने लगती हैं।
मुशायरे में देशभर से आए नामचीन शायरों ने अपनी ग़ज़लों और नज़्मों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रमुख शायरों में अबरार काशिफ, मक़सूद नश्तरी, उर्दू अकादमी की डायरेक्टर डॉ. नुसरत मेहंदी, आदिल रशीद, रईस अनवर, फ़ाज़िल फ़ैज़ भोपाली, इब्राहीम अली जीशान, डॉ. कविता किरण, ईशिका चंदेलिया और इमरान यूसुफ़ज़ई शामिल रहे।
मुशायरे की सदारत नईम अख़्तर खादिमी ने की, जबकि शानदार निज़ामत इक़बाल यूसुफ लखनवी ने अंजाम दी। कार्यक्रम के कन्वीनर बदर-ए-मुनीर और तजदीद शाकी रहे। इस अवसर पर सोडानी जी द्वारा सभी शायरों का माल्यार्पण एवं स्मृति-चिह्न देकर सम्मान किया गया।
कार्यक्रम के समापन पर हाजी रिज़वान खिलजी ने सभी मेहमानों, शायरों और उपस्थित श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।
“याद-ए-साक़ी” की यह यादगार शाम यह संदेश देकर समाप्त हुई कि जब शायरी इंसानियत की आवाज़ बन जाए और न्याय मोहब्बत का रास्ता दिखाए, तब समाज में अमन, भाईचारा और एकता की नई सुबह जन्म लेती है।












