डिंडौरी। जिले की ग्राम पंचायत मझगांव एक बार फिर भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े को लेकर सुर्खियों में है। यहां सरकारी योजनाओं के तहत दर्जनों निर्माण कार्य कागजों में पूरे दिखाए गए, लेकिन हकीकत में मजदूरों को मजदूरी तक नहीं मिली। इसके उलट, लाखों रुपये की पूरी राशि सीधे सप्लायरों को भुगतान कर दी गई, जिससे पूरे मामले में बड़ा घोटाला सामने आया है।
जानकारी के अनुसार, कुछ वर्ष पूर्व सोशल ऑडिट टीम ने मनरेगा कार्यों के भौतिक सत्यापन के दौरान गंभीर अनियमितताएं उजागर की थीं। जांच में आधा दर्जन से अधिक कार्य केवल कागजों में ही पूर्ण पाए गए थे। इस फर्जीवाड़े में गबन की गई राशि की वसूली की प्रक्रिया आज भी जिला पंचायत स्तर पर लंबित है।

बताया जा रहा है कि पहले सामने आए मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं होने के कारण सरपंच और सचिव के हौसले बुलंद हैं। यही वजह है कि ग्राम पंचायत में लगातार मनमानी और भ्रष्टाचार का खेल जारी है।
– चार साल में लाखों का खेल
ग्राम पंचायत मझगांव के सरपंच शिव कुमार और सचिव लोकराम यादव द्वारा वित्तीय वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक 15वें वित्त आयोग की राशि में भारी अनियमितताएं की गई हैं। पोर्टल पर दर्ज जानकारी के मुताबिक, सीसी रोड, लीच पिट, स्टॉपडेम, पुलिया, नल-जल योजना, शौचालय और नाली सहित कई निर्माण कार्य कराए गए। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इन कार्यों में एक भी मजदूर को मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया। इसके बजाय निर्माण कार्यों की पूरी राशि सीधे सप्लायरों को ट्रांसफर कर दी गई।
– मजदूरों के हक पर डाका
आदिवासी बहुल डिंडौरी जिले में जहां ग्रामीण मजदूर रोजगार के अभाव में पलायन को मजबूर हैं, वहीं पंचायत स्तर पर उनके हकों का खुलेआम हनन किया जा रहा है। मनरेगा जैसी योजना, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को रोजगार देना है, वहीं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।

बड़ा सवाल: बिना मजदूर कैसे बने निर्माण?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिना मजदूरों के आखिर ये निर्माण कार्य कैसे पूरे हो गए? या फिर पूरा खेल फर्जी बिल और कागजी कामों के सहारे किया गया? मामले में यह भी सामने आया है कि पंचायत द्वारा मध्यप्रदेश भंडार क्रय नियमों की अनदेखी करते हुए चहेते सप्लायरों को लाभ पहुंचाया गया। मरावी मैटेरियल सप्लायर नरेंद्र सिंह करचाम और सुहाने मैटेरियल सप्लायर (घुटास) को लाखों रुपये का भुगतान किया गया। हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों को भुगतान किया गया, उनमें से कुछ का वाणिज्यिक कर (GST) में पंजीयन तक नहीं है। जबकि नियमों के अनुसार केवल पंजीकृत विक्रेताओं को ही भुगतान किया जा सकता है।
बगैर मजदूरों के दर्जनों कार्य कराए जाने को लेकर ग्राम पंचायत के सरपंच, सचिव से पक्ष जानने हेतु दूरभाष से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।









