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OBC आरक्षण मामले में मप्र सरकार की गैरहाजिरी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ऐसे कैसे होगी सुनवाई?

रिपोर्ट: Chetram Rajpoot January 30, 2026

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जबलपुर/नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण प्रकरणों की सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोई भी अधिवक्ता उपस्थित नहीं होने पर न्यायालय ने गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए खेद जताया। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (नर्सिम्मा) एवं न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ के समक्ष ये सभी मामले सीरियल क्रमांक 106 पर अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध थे।

निर्धारित क्रमांक पर जैसे ही मामलों को पुकारा गया, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोर्ट में बहस के लिए एक भी वकील उपस्थित नहीं हुआ। यह स्थिति तब सामने आई, जब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए सालिसिटर जनरल तुषार मेहता सहित पांच वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नियुक्त कर रखा है। सरकार की इस लापरवाही और उदासीन रवैये को देखते हुए कोर्ट ने इसे अत्यंत गंभीर आचरण बताया और स्पष्ट शब्दों में खेद प्रकट किया।

कोर्ट के समक्ष उपस्थित ओबीसी वर्ग के पैरोकार वरिष्ठ अधिवक्ताओं—अनूप जॉर्ज चौधरी, जून चौधरी, रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं वरुण ठाकुर—ने न्यायालय को अवगत कराया कि बीते छह वर्षों से लाखों ओबीसी युवा आरक्षण के अभाव में रोजगार से वंचित हैं। उन्होंने यह भी बताया कि न तो हाईकोर्ट और न ही सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने वाले कानून पर कोई स्थगन आदेश दिया है, इसके बावजूद राज्य सरकार भर्ती प्रक्रियाओं में केवल 14 प्रतिशत आरक्षण लागू कर रही है और शेष 13 प्रतिशत पद नियम विरुद्ध रूप से होल्ड कर रही है।

अधिवक्ताओं ने कोर्ट को यह भी बताया कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हाईकोर्ट से ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराए गए, ताकि 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का दबाव न बने। लगभग एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी हर सुनवाई में सरकार समय मांगती रही, लेकिन आज तो सरकार ने सभी सीमाएं पार करते हुए कोर्ट में उपस्थिति तक दर्ज नहीं कराई।

इस पर खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब सरकार की ओर से कोई अधिवक्ता मौजूद ही नहीं है, तो न्यायालय सुनवाई कैसे कर सकती है। कोर्ट ने सरकार के इस रवैये को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया। ओबीसी पक्ष के अधिवक्ताओं के निवेदन पर न्यायालय ने सभी मामलों की अगली सुनवाई 4 फरवरी 2026 को नियत की।

यह मामला न केवल संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि लाखों युवाओं के भविष्य से भी सीधे तौर पर संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी राज्य सरकार के लिए एक कड़ा संदेश मानी जा रही है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायालय अब इस विषय में अनावश्यक देरी को गंभीरता से ले रहा

एडीटर

Chetram Rajpoot

चेतराम राजपूत ‘मध्यभूमि के बोल’ के संपादक हैं और दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार के खुलासे और जमीनी खोजी पत्रकारिता के लिए उनकी पहचान है।...

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