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अपात्रों को नौकरी बांटने वाले अफसरों की अब खैर नहीं! अवैध अनुकंपा नियुक्तियों पर हाई कोर्ट का FIR का आदेश

एडीटर: Chetram Rajpoot November 5, 2026

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– अपात्रों को नियम विरुद्ध नौकरी देने वाले तत्कालीन कलेक्टर और CMHO भी जांच के दायरे में, लोकायुक्त पुलिस को 30 दिन में प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पेश करने के निर्देश

 

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जबलपुर/डिंडौरी। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने अवैध अनुकंपा नियुक्तियों के मामले में एक महत्वपूर्ण और सख्त आदेश पारित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि नियमों को ताक पर रखकर अपात्र व्यक्तियों को सरकारी नौकरी देने वाले अधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। केवल अवैध नियुक्तियां निरस्त कर संबंधित कर्मचारियों को सेवा से हटाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसे नियुक्ति आदेश जारी करने और उन्हें अनुमोदित करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की आपराधिक जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकल पीठ ने छिंदवाड़ा के अनुकंपा नियुक्ति प्रकरण में विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) को तत्कालीन कलेक्टर, तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), अनुचित लाभ प्राप्त करने वाले अपात्र कर्मचारियों और अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने लोकायुक्त पुलिस को 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। इस आदेश को सरकारी नियुक्तियों में प्रशासनिक मनमानी और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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– वैध आवेदक को किया दरकिनार, अपात्रों को मिल गई नौकरी

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पूरा मामला छिंदवाड़ा निवासी नितिन मालवी की अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने वर्ष 2010 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन प्रस्तुत किया था। आरोप है कि प्रशासन ने उनके आवेदन को खारिज कर दिया, जबकि इसी दौरान नियमों के विपरीत अपात्र व्यक्तियों को अनुकंपा नियुक्तियां प्रदान कर दी गईं।

अपने साथ हुई प्रशासनिक उपेक्षा और कथित अनियमितताओं को लेकर नितिन मालवी ने वर्ष 2017 में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की शरण ली और रिट याचिका दायर की। मामले की सुनवाई के दौरान स्वास्थ्य विभाग में हुई नियुक्तियों की अनियमितताओं का मुद्दा सामने आया।

– शासन ने स्वीकार की गलत नियुक्तियां, लेकिन अधिकारियों की जवाबदेही पर उठा सवाल

सुनवाई के दौरान शासन की ओर से स्वीकार किया गया कि स्वास्थ्य विभाग में कुछ नियुक्तियां गलत तरीके से की गई थीं और ऐसे कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं। इसके अलावा तत्कालीन कलेक्टर द्वारा नियुक्त एक अन्य कर्मचारी को नोटिस जारी किए जाने की जानकारी भी दी गई।

हालांकि, हाई कोर्ट ने प्रशासन की इस कार्रवाई को पर्याप्त नहीं माना। न्यायालय ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि नियुक्तियां नियम विरुद्ध थीं और अपात्र व्यक्तियों को सरकारी सेवा में शामिल किया गया था, तो ऐसे निर्णय लेने वाले, नियुक्तियों को स्वीकृति देने वाले और पूरी प्रक्रिया में शामिल जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच क्यों नहीं की गई?

अदालत का स्पष्ट रुख रहा कि अवैध नियुक्तियों के लिए केवल लाभ प्राप्त करने वाले कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराकर उन अधिकारियों को बचाया नहीं जा सकता, जिनके निर्णय और अनुमोदन से ऐसी नियुक्तियां संभव हुईं।

– लोकायुक्त करेगा अधिकारियों की भूमिका की जांच

हाई कोर्ट ने विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) को इस पूरे मामले की जांच करने के निर्देश दिए हैं। जांच के दायरे में छिंदवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर, तत्कालीन CMHO, अनुचित लाभ प्राप्त करने वाले अपात्र कर्मचारी तथा अन्य संबंधित अधिकारी शामिल होंगे।

न्यायालय के निर्देशानुसार लोकायुक्त पुलिस को पूरे प्रकरण की गहन जांच कर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई करनी है। साथ ही 30 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी। प्रकरण की अगली सुनवाई 15 दिसंबर 2026 निर्धारित की गई है।

 

-नियुक्ति निरस्त करने से नहीं मिलेगी अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्ति

 

इस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकारी विभागों में लंबे समय से चली आ रही उस कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करना है, जिसमें अनियमित नियुक्तियां सामने आने के बाद संबंधित कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर मामले को समाप्त मान लिया जाता है। लेकिन जिन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी कर नियुक्तियां कीं या उन्हें मंजूरी दी, उनकी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया अक्सर आगे नहीं बढ़ती।

 

हाई कोर्ट के इस रुख से स्पष्ट संदेश गया है कि सरकारी पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिकारों का दुरुपयोग, नियमों की अनदेखी और अपात्र व्यक्तियों को अनुचित लाभ पहुंचाने जैसे मामलों में संबंधित अधिकारियों की भूमिका की भी जांच आवश्यक है।

 

अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत शासकीय सेवक के आश्रित परिवार को आर्थिक संकट से राहत प्रदान करना है। यह व्यवस्था पात्रता और निर्धारित नियमों के अधीन संचालित होती है। ऐसे में यदि सक्षम अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर अपात्र व्यक्तियों को लाभ पहुंचाते हैं और पात्र आवेदकों को दरकिनार करते हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक अनियमितता का विषय बनता है, जिसकी कानूनी जांच और जवाबदेही जरूरी है।

 

– सरकारी नियुक्तियों में जवाबदेही तय करने की दिशा में अहम संदेश

मध्यप्रदेश हाई कोर्ट का यह आदेश उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है, जहां विभागीय स्तर पर कथित मिलीभगत या प्रशासनिक संरक्षण में नियम विरुद्ध नियुक्तियां की जाती हैं। अदालत ने यह स्पष्ट करने की दिशा में सख्त रुख अपनाया है कि सरकारी नियुक्तियों में अनियमितता होने पर कार्रवाई केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, जिसे अनुचित लाभ मिला है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लोकायुक्त पुलिस की जांच में तत्कालीन अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों की क्या भूमिका सामने आती है तथा अदालत के निर्देशों के अनुपालन में आगे क्या कार्रवाई होती है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता नितिन मालवी की रिट याचिका पर 3 नवंबर 2026 को यह महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।

 

एडीटर

Chetram Rajpoot

चेतराम राजपूत ‘मध्यभूमि के बोल’ के संपादक हैं और दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार के खुलासे और जमीनी खोजी पत्रकारिता के लिए उनकी पहचान है।...

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