– डिंडौरी-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाल राइडिंग सरफेस पर न्यायालय ने जताई नाराजगी, सुधार नहीं होने पर विभागीय और लोकायुक्त जांच की चेतावनी
– देवरा की नल-जल योजना में भी एक माह में निराकरण और ठेकेदार को किए भुगतान का ब्योरा तलब
डिंडौरी न्यूज ।डिंडौरी से जबलपुर तक निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग की बदहाल राइडिंग सरफेस और सड़क पर वाहनों को लग रहे झटकों के मामले में लोकोपयोगी लोक अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। शनिवार को प्रथम जिला न्यायाधीश एवं लोकोपयोगी लोक अदालत के अध्यक्ष डी.एस. मंडलोई के समक्ष हुई सुनवाई में सड़क की वास्तविक स्थिति और विभागीय रिपोर्ट के दावों के बीच अंतर को लेकर सवाल उठे। न्यायालय ने लोक निर्माण विभाग, राष्ट्रीय राजमार्ग के कार्यपालन यंत्री को दो माह के भीतर सड़क की कमियों का सुधार कर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। साथ ही निर्धारित समय में सुधार नहीं होने पर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच और लोकायुक्त जांच प्रस्तावित करने की चेतावनी दी।
इसी सुनवाई के दौरान ग्राम पंचायत देवरा के हंसनगर एवं साकेत नगर में नल-जल योजना के क्रियान्वयन का मामला भी उठा। यहां विभाग ने नियमित पेयजल आपूर्ति का दावा किया, जबकि आवेदक पक्ष ने जमीनी स्थिति इससे अलग बताई। न्यायालय ने पेयजल समस्या का एक माह में निराकरण सुनिश्चित करने और योजना के तहत ठेकेदार को किए गए भुगतान की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। दोनों मामलों में न्यायालय के सख्त रुख से निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, विभागीय जवाबदेही और आम नागरिकों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया है।
– सड़क अच्छी होने की रिपोर्ट पर उठे सवाल
डिंडौरी-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग की स्थिति को लेकर सुनवाई के दौरान कार्यपालन यंत्री ने निर्माण कार्य में अनियमितताओं के आरोपों को निराधार बताते हुए न्यायालय के समक्ष विभागीय जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। विभाग की ओर से बताया गया कि सड़क की स्थिति अच्छी है, निर्माण एजेंसी की परफॉर्मेंस गारंटी अवधि अभी जारी है और ठेकेदार द्वारा लगातार रखरखाव का कार्य किया जा रहा है।

हालांकि, आवेदनकर्ता अधिवक्ता सम्यक जैन एवं के.के. सोनी ने विभागीय रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज कराते हुए सड़क की वास्तविक स्थिति का मुद्दा उठाया। अधिवक्ताओं का कहना था कि किसी सड़क को रिपोर्ट में अच्छी बता देने मात्र से उसकी गुणवत्ता प्रमाणित नहीं हो जाती। मौके पर सड़क की राइडिंग सरफेस की स्थिति अलग है और वाहनों के गुजरने पर झटके लगने से यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इससे सड़क की गुणवत्ता के साथ-साथ वाहन चालकों और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।
अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि निर्माण एजेंसी की परफॉर्मेंस गारंटी का प्रावधान निर्माण के बाद की जवाबदेही से संबंधित है। इसका अर्थ यह नहीं है कि निर्माण के दौरान निर्धारित तकनीकी मानकों और गुणवत्ता की अनदेखी को स्वीकार कर लिया जाए। यदि अर्थवर्क, डब्ल्यूएमएम और सीआरएम जैसे आधारभूत निर्माण कार्य निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं किए जाते हैं, तो इसका असर सड़क की अंतिम सतह पर दिखाई दे सकता है। सड़क पर उबड़-खाबड़पन और वाहनों को लगने वाले झटकों को इसी संदर्भ में गंभीरता से जांचे जाने की आवश्यकता बताई गई।
– पुल-पुलियों की एप्रोच पर सेटलमेंट की बात स्वीकार
सुनवाई के दौरान सड़क की तकनीकी स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य तब सामने आया, जब कार्यपालन यंत्री ने स्वीकार किया कि कुंडम-शहपुरा मार्ग खंड में मौजूद पुल-पुलियों की एप्रोच पर सेटलमेंट होने के कारण अनड्यूलेशन यानी सतह में ऊंच-नीच की स्थिति उत्पन्न हुई है। विभाग की ओर से बताया गया कि इन कमियों को दूर करने के लिए सुधार कार्य कराया जा रहा है।
पुल-पुलियों की एप्रोच पर तकनीकी खामी स्वीकार किए जाने के बाद सड़क की समग्र गुणवत्ता और विभागीय रिपोर्ट की विश्वसनीयता को लेकर सवाल और महत्वपूर्ण हो गए। अधिवक्ताओं ने वास्तविक स्थिति का समुचित परीक्षण कराने और कमियों के प्रभावी निराकरण पर जोर दिया।
– प्रभारी मंत्री के निरीक्षण का हवाला देने पर न्यायालय की नाराजगी
सुनवाई के दौरान कार्यपालन यंत्री द्वारा यह बताए जाने पर कि सड़क का निरीक्षण प्रभारी मंत्री भी कर चुके हैं, न्यायालय ने नाराजगी जताई। सुनवाई में न्यायालय की टिप्पणी का आशय था कि यदि निरीक्षण, बुलावे और फोटो सेशन पर खर्च होने वाली राशि सड़क के गुणवत्तापूर्ण निर्माण पर लगाई जाती, तो संभवतः शिकायत को इस स्तर तक आने की नौबत नहीं आती।
न्यायालय ने विभागीय रिपोर्ट के आधार पर वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम पैदा नहीं करने की हिदायत भी दी। सड़क की कमियों को दूर करने के लिए कार्यपालन यंत्री को दो माह की समय-सीमा निर्धारित की गई है। इस अवधि में सुधार कार्य पूरा कर न्यायालय को अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी
न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ, तो जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच कराई जा सकती है। इसके लिए विभागीय जांच और लोकायुक्त जांच प्रस्तावित किए जाने की बात कही गई। अब सड़क की वास्तविक स्थिति में सुधार और प्रस्तुत अनुपालन रिपोर्ट पर मामले की अगली दिशा निर्भर करेगी।
– देवरा की नल-जल योजना पर भी विभागीय दावे को चुनौती
लोकोपयोगी लोक अदालत में जनहित से जुड़े दूसरे मामले में ग्राम पंचायत देवरा के अंतर्गत हंसनगर एवं साकेत नगर की नल-जल प्रदाय योजना पर सुनवाई हुई। इस मामले में कार्यपालन यंत्री ने जवाब प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि सभी बसाहटों में नियमित रूप से शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जा रही है और वर्तमान में पानी की कोई समस्या नहीं है।
विभाग के इस दावे पर अधिवक्ता सम्यक जैन एवं के.के. सोनी ने आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने पेंशन एसोसिएशन के आवेदक सदस्यों को न्यायालय के समक्ष उपस्थित कराकर उनकी बात रखी। आवेदक पक्ष ने विभागीय रिपोर्ट को वास्तविक परिस्थितियों के विपरीत बताते हुए कहा कि नागरिकों को नियमित रूप से पेयजल उपलब्ध नहीं हो रहा है। आरोप लगाया गया कि रिपोर्ट में समस्या का वास्तविक स्वरूप सामने नहीं आ रहा है।
इस तरह नल-जल योजना के मामले में भी विभागीय दावे और आवेदक पक्ष की शिकायत के बीच अंतर सामने आया। न्यायालय ने मामले को गंभीरता से लेते हुए एक माह के भीतर पेयजल आपूर्ति की समस्या का निराकरण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।
– ठेकेदार को किए भुगतान का पूरा ब्योरा मांगा
देवरा नल-जल योजना की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केवल पेयजल आपूर्ति की समस्या दूर करने के निर्देश ही नहीं दिए, बल्कि योजना के तहत ठेकेदार को अब तक किए गए भुगतान की विस्तृत जानकारी भी तलब की। इससे योजना के क्रियान्वयन, भुगतान और नागरिकों को मिल रही सुविधा की स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता सामने आई है।
न्यायालय ने चेतावनी दी कि निर्धारित अवधि में जनोपयोगी कार्य नहीं हुए और आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ा, तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जा सकती है। सुनवाई के दौरान विभागीय जांच, लोकायुक्त जांच और जेल तक की चेतावनी दिए जाने की बात भी सामने आई।
अब संबंधित विभाग को एक माह के भीतर पेयजल आपूर्ति की समस्या के निराकरण के साथ भुगतान संबंधी विवरण प्रस्तुत करना होगा। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि योजना के क्रियान्वयन और भुगतान की स्थिति क्या है तथा नागरिकों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
– अब कागजी रिपोर्ट नहीं, धरातल पर सुधार की परीक्षा
डिंडौरी-जबलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग और देवरा की नल-जल योजना, दोनों मामले सीधे आम नागरिकों की सुरक्षा, सुविधा और जीवन से जुड़े हैं। एक ओर सड़क की गुणवत्ता और तकनीकी कमियों का सवाल है, तो दूसरी ओर घरों तक नियमित पेयजल पहुंचाने की जिम्मेदारी। दोनों मामलों में विभागीय दावों के विपरीत शिकायतें सामने आने के बाद न्यायालय ने समय-सीमा तय कर सुधार के निर्देश दिए हैं।
अब सड़क के मामले में दो माह और नल-जल योजना के मामले में एक माह की अवधि महत्वपूर्ण होगी। सड़क पर वाहनों को लगने वाले झटकों की समस्या दूर होती है या नहीं, पुल-पुलियों की एप्रोच की कमियों का प्रभावी सुधार होता है या नहीं और हंसनगर-साकेत नगर में नियमित पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित होती है या नहीं, इन सवालों के जवाब धरातल पर किए जाने वाले कार्यों से ही मिलेंगे।
न्यायालय के निर्देशों के बाद संबंधित विभागों की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण हो गई है। अब केवल विभागीय दावों और कागजी रिपोर्ट के बजाय वास्तविक सुधार, तकनीकी स्थिति और नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर ही कार्यों की प्रभावशीलता का आकलन होगा।
– आवारा कुत्तों और तालाब में सीवर लाइन का मामला भी प्रस्तावित
इसी लोकोपयोगी लोक अदालत में आवारा कुत्तों के आतंक तथा शहर के तालाब में सीवर लाइन डालने से संबंधित मामलों की सुनवाई भी प्रस्तावित थी। हालांकि, इन दोनों मामलों में विस्तृत कार्रवाई और पारित आदेशों की जानकारी फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
