भोपाल/मंडला। गोंडी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मांग को लेकर लंबे समय से प्रयास कर रहे मंडला जिले के विधायक नारायण सिंह पट्टा को केंद्रीय गृह मंत्रालय से जवाब प्राप्त हुआ है। केंद्र सरकार की ओर से भेजे गए पत्र में इस विषय पर स्पष्ट रूप से न तो सहमति जताई गई है और न ही असहमति, लेकिन यह जरूर कहा गया है कि इस प्रकार के प्रस्तावों पर विचार करते समय विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार विधायक नारायण सिंह पट्टा ने 15 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री को पत्र सौंपकर गोंडी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की थी। इसके बाद इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्रालय के आईएस-I प्रभाग से 19 फरवरी 2026 को पत्र जारी कर उन्हें अवगत कराया गया है।
पत्र में बताया गया है कि वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं। गोंडी भाषा सहित कई अन्य भाषाओं को भी इस सूची में शामिल करने की मांग समय-समय पर उठती रही है। गृह मंत्रालय ने यह भी उल्लेख किया है कि भाषाओं और बोलियों का विकास एक गतिशील प्रक्रिया है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से प्रभावित होती है। इसलिए किसी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए स्पष्ट मानदंड तय करना जटिल माना जाता है।
पत्र में यह भी बताया गया कि पहले पाहवा समिति (1996) और सीताकांत महापात्र समिति (2003) के माध्यम से इस विषय पर मानदंड तय करने का प्रयास किया गया था, लेकिन इस संबंध में कोई ठोस मानक तय नहीं हो सके। भारत सरकार ने यह भी कहा है कि आठवीं अनुसूची में अन्य भाषाओं को शामिल करने से जुड़ी भावनाओं और मांगों को ध्यान में रखते हुए ऐसे प्रस्तावों पर समग्र रूप से विचार किया जाता है।
इस संबंध में विधायक नारायण सिंह पट्टा ने कहा कि गोंडी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए वे कई वर्षों से लगातार प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली में केंद्रीय मंत्री को पत्र देने के बाद गृह मंत्रालय से जवाब मिला है, जिसमें न तो स्पष्ट स्वीकृति दी गई है और न ही इनकार किया गया है।
उन्होंने कहा कि “गोंडी भाषा हमारे आदिवासी समाज की पहचान और सांस्कृतिक विरासत है। इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के लिए हमारा संघर्ष और प्रयास लगातार जारी रहेगा।”
विधायक पट्टा ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में केंद्र सरकार आदिवासी समाज की भावनाओं को समझते हुए गोंडी भाषा को भी संवैधानिक मान्यता प्रदान करने की दिशा में सकारात्मक निर्णय लेगी।







