डिंडौरी / भोपाल। मंडला जिले की बहुचर्चित अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है। आदिवासी बहुल क्षेत्र में प्रस्तावित इस परियोजना को लेकर की गई शिकायत पर केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने गंभीर रुख अपनाते हुए मध्यप्रदेश सरकार से विस्तृत रिपोर्ट और जवाब तलब किया है। मंत्रालय द्वारा भेजे गए पत्र के बाद राज्य सरकार और संबंधित विभागों पर मामले की जांच कर तथ्यात्मक जानकारी उपलब्ध कराने का दबाव बढ़ गया है।

जानकारी के अनुसार, डिंडोरी जिला सरपंच संघ के जिलाध्यक्ष इंजीनियर फूल सिंह मरकाम, कामता सिंह परस्ते सहित 22 ग्रामीणों ने इस परियोजना में कथित अनियमितताओं और नियमों के उल्लंघन की शिकायत देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं को भेजी थी। शिकायत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंचाई गई, जिसमें आदिवासी क्षेत्रों के संवैधानिक अधिकारों और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
– केंद्र ने लिया संज्ञान, राज्य से मांगी रिपोर्ट
दिल्ली स्थित पर्यावरण मंत्रालय ने शिकायत को गंभीर मानते हुए मध्यप्रदेश शासन के प्रमुख सचिव (वन) को पत्र भेजकर पूरे मामले की जांच कराने और नियमानुसार की गई कार्रवाई की जानकारी मंत्रालय को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। केंद्र के इस हस्तक्षेप के बाद अब परियोजना की प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े हो गए हैं।
– ग्राम सभाओं की सहमति बिना शुरू करने का आरोप
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मंडला जिले के 5वीं अनुसूचित क्षेत्र में प्रस्तावित इस परियोजना को ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना ही आगे बढ़ाया जा रहा है। आरोप है कि वन भूमि के अधिग्रहण और निर्माण से संबंधित प्रक्रियाएं शुरू कर दी गईं, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे मामलों में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होती है।

– 7.5 करोड़ के भुगतान पर भी उठे सवाल
शिकायत में यह भी गंभीर आरोप लगाया गया है कि परियोजना को अभी वैधानिक स्वीकृतियां प्राप्त नहीं हुई थीं, इसके बावजूद लगभग 7.5 करोड़ रुपये की सामग्री खरीदी और भुगतान कर दिया गया। शिकायतकर्ताओं के अनुसार यह सरकारी वित्तीय नियमों और प्रक्रिया का उल्लंघन हो सकता है, जिसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
– 22 गांव होंगे प्रभावित, बड़ी वन भूमि डूब क्षेत्र में
परियोजना से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार इस बांध के निर्माण से करीब 22 गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से प्रभावित होंगे। अनुमान है कि लगभग 1801 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में आएगी, जिसमें करीब 672 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल है। इससे हजारों आदिवासी परिवारों के विस्थापन और आजीविका पर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
– PESA और FRA कानून की अनदेखी का आरोप
शिकायत में यह भी कहा गया है कि परियोजना को PESA Act 1996, Forest Rights Act 2006 और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के प्रावधानों की अनदेखी करते हुए आगे बढ़ाया जा रहा है। इन कानूनों के तहत अनुसूचित और आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी विकास परियोजना से पहले ग्राम सभा की अनुमति और स्थानीय समुदाय की सहमति अनिवार्य मानी जाती है।
– केंद्र के पत्र से बढ़ा दबाव, जांच के बाद हो सकता है बड़ा फैसला
पर्यावरण मंत्रालय द्वारा राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगे जाने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर मामले की जांच तेज होने की संभावना है। यदि जांच में शिकायत के आरोप सही पाए जाते हैं तो परियोजना की प्रक्रिया पर रोक लगाने, स्वीकृतियों की पुनः समीक्षा करने या नए सिरे से प्रक्रिया अपनाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।







