– जांच में खुली गड़बड़ी,कार्रवाई से बचते रसूखदार
– डिंडौरी प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
डिंडौरी न्यूज। आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी जिले में एक ओर जहां गरीबों और जरूरतमंदों की झोपड़-पट्टियों को अतिक्रमण हटाने के नाम पर बेरहमी से उजाड़ दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय में वरिष्ठ अधिकारियों की नाक के नीचे सरकारी कर्मचारी करोड़ों रुपये मूल्य की शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा कर पक्के मकान खड़े कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ऐसे मामलों में शासन–प्रशासन की सख्ती कहीं नजर नहीं आती, जिससे प्रशासनिक निष्पक्षता और कानून के समान क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
शासकीय आवास हेतु आरक्षित भूमि पर कब्जा
जानकारी के अनुसार ग्राम मौजा डिंडौरी स्थित नजूल भूमि, शीट नंबर–2 के अंतर्गत विभिन्न प्लॉटों पर वर्ष 2023 में कुछ शासकीय कर्मचारियों को धारणाधिकार के तहत पट्टे जारी किए गए। जबकि यह भूमि पूर्व से ही मध्यप्रदेश शासन, राजस्व विभाग द्वारा शासकीय आवास निर्माण हेतु आरक्षित थी और राजस्व अभिलेखों में इसका नामांकन स्पष्ट रूप से “नजूल शासकीय आवास हेतु आरक्षित” दर्ज है।

जिन व्यक्तियों को पट्टा दिया गया, उनमें— श्रीमती मंजू द्विवेदी पति श्री एस.के. द्विवेदी (प्लॉट नंबर 33/1, रकबा 128.6 वर्गमीटर), श्रीमती सुमन बनावल पति श्री राजकुमार बनावल (प्लॉट नंबर 33/1, रकबा 156.41 वर्गमीटर), श्री महेश प्रसाद झारिया पिता शिवगुलाम झारिया (खसरा नंबर 22, रकबा 114005 वर्गफुट), श्रीमती संध्या यादव पिता नवल किशोर यादव (प्लॉट नंबर 33/1, रकबा 55.74 वर्गमीटर) शामिल हैं।
आरोप है कि ये सभी शासकीय कर्मचारी पहले से ही शासन द्वारा आवंटित सरकारी आवास में रह रहे थे, इसके बावजूद उन्होंने जिम्मेदार अधिकारियों से सांठगांठ कर नियमों को ताक पर रखकर धारणाधिकार का पट्टा हासिल कर लिया।
जांच में खुली पोल, फिर भी कार्रवाई शून्य
मामले की शिकायत सामने आने पर तत्कालीन कलेक्टर नेहा मारव्या ने तहसीलदार एवं अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) से जांच कराई। जांच रिपोर्ट और स्थल निरीक्षण में स्पष्ट हुआ कि पट्टे नियमविरुद्ध तरीके से जारी किए गए हैं। इसके बाद कलेक्टर के आदेश पर संबंधित पट्टों को निरस्त कर दिया गया। हालांकि, यहीं पर प्रशासनिक कार्रवाई की गति थम गई। न तो अवैध कब्जा हटाने की प्रभावी पहल की गई और न ही धोखाधड़ी कर पट्टा हासिल करने वाले शासकीय कर्मचारियों एवं पट्टा जारी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई की गई। इससे यह संदेश गया कि नियम-कानून केवल कागजों तक सीमित हैं।
गरीबों पर सख्ती, रसूखदारों को राहत?
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की यह दोहरी नीति समझ से परे है। गरीब आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां बिना वैकल्पिक व्यवस्था के तोड़ दी जाती हैं, लेकिन जब बात प्रभावशाली सरकारी कर्मचारियों की आती है, तो नियमों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जनचर्चा है कि क्या नियम और कानून सिर्फ गरीबों के लिए बने हैं? क्या रसूखदारों और सरकारी कर्मचारियों के सामने शासन–प्रशासन बेबस हो जाता है? यदि पट्टे निरस्त हो चुके हैं, तो फिर अब तक अवैध कब्जा क्यों नहीं हटाया गया और दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।









