– दिव्यांगों के परीक्षण एवं चिन्हांकन के दौरान विवाद; प्रमाण पत्रों में दिव्यांगता का प्रतिशत कम दर्ज करने के आरोपों से भी नाराजगी
शहपुरा/डिंडौरी।शासन की मंशा जरूरतमंदों तक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने और पात्र हितग्राहियों को चिह्नित कर उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराने की है। इसके लिए जिले में विभिन्न जनकल्याणकारी शिविरों का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इन शिविरों में हितग्राहियों के साथ व्यवहार और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठने लगें, तो अभियान के उद्देश्यों पर भी प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। ऐसा ही एक मामला डिंडौरी जिले की जनपद पंचायत शहपुरा में सामने आया है, जहां सेवा संकल्प अभियान के तहत आयोजित दिव्यांगजनों एवं वरिष्ठ नागरिकों के परीक्षण और चिन्हांकन शिविर में डॉक्टर और ग्रामीणों के बीच विवाद हो गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
– परीक्षण शिविर के दौरान बढ़ी कहासुनी
जानकारी के अनुसार, शनिवार को जनपद पंचायत शहपुरा में सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत दिव्यांगजनों एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए परीक्षण एवं चिन्हांकन शिविर आयोजित किया गया था। शिविर का उद्देश्य पात्र हितग्राहियों का परीक्षण कर उन्हें विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए चिन्हित करना था। इसी उम्मीद के साथ दिव्यांगजन और ग्रामीण शिविर में पहुंचे थे।
बताया जाता है कि शिविर के दौरान किसी बात को लेकर डॉक्टर और ग्रामीणों के बीच कहासुनी शुरू हो गई। आरोप है कि चिकित्सक ने ग्रामीणों से कथित तौर पर यहां से भागने के लिए कहा। इस पर ग्रामीणों ने भी नाराजगी जताई और जवाब देते हुए कहा कि यह जनपद पंचायत उनकी है, इसलिए डॉक्टर यहां से जाएं। देखते ही देखते बातचीत ने विवाद का रूप ले लिया और दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस होने लगी। घटनाक्रम का वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में है।
– कर्मचारियों और पंचायत सचिवों ने कराया शांत
विवाद बढ़ता देख जनपद पंचायत के कर्मचारियों और ग्राम पंचायतों के सचिवों ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने दोनों पक्षों को समझाइश देकर शांत कराया, जिसके बाद स्थिति सामान्य हुई। हालांकि, विवाद की वास्तविक वजह क्या थी और घटनाक्रम के दौरान किसकी क्या भूमिका रही, इसे लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।
– दिव्यांगता प्रतिशत कम दर्ज करने के आरोप
विवाद के बीच दिव्यांगजनों के परीक्षण और प्रमाण पत्रों में दिव्यांगता का प्रतिशत दर्ज किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों के हवाले से आरोप है कि कुछ ऐसे दिव्यांगजन, जिनकी दिव्यांगता 50 से 60 प्रतिशत तक बताई जा रही है, उनके प्रमाण पत्रों में कथित तौर पर केवल 30 प्रतिशत दिव्यांगता दर्ज की गई। इसको लेकर संबंधित हितग्राहियों में नाराजगी होने की बात कही जा रही है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि संबंधित हितग्राहियों का चिकित्सकीय परीक्षण किन मानकों के आधार पर किया गया, दिव्यांगता का प्रतिशत किस प्रक्रिया से निर्धारित हुआ और प्रमाण पत्रों में दर्ज प्रतिशत को लेकर उठाई जा रही आपत्तियों में कितनी सच्चाई है।
– सेवा संकल्प अभियान के उद्देश्य पर उठे सवाल
शिविर में लगाए गए बैनर के अनुसार, सेवा संकल्प अभियान के तहत एडीआईपी (ADIP) एवं राष्ट्रीय वयोश्री योजना के अंतर्गत दिव्यांगजनों और वरिष्ठ नागरिकों के परीक्षण एवं चिन्हांकन की व्यवस्था की गई थी। इन योजनाओं का उद्देश्य पात्र लोगों की जरूरतों के अनुरूप सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना है।
ऐसे शिविरों में पहुंचने वाले हितग्राहियों में बड़ी संख्या उन लोगों की होती है, जिन्हें शासकीय योजनाओं से मिलने वाली सहायता की जरूरत होती है। उनके लिए चिकित्सकीय परीक्षण, उचित मार्गदर्शन और सम्मानजनक व्यवहार बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में शिविर के दौरान डॉक्टर और ग्रामीणों के बीच विवाद की स्थिति बनने से आयोजन की व्यवस्था तथा हितग्राहियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
– जांच और स्पष्टीकरण का इंतजार
फिलहाल विवाद के कारणों, चिकित्सक की भूमिका और दिव्यांगता प्रतिशत को लेकर लगाए गए आरोपों पर संबंधित विभाग की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आना बाकी है। मामले में निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है, ताकि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय हो सके और यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।
अब देखना होगा कि संबंधित अधिकारी इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और शिविर में पहुंचे हितग्राहियों की शिकायतों का निराकरण किस तरह किया जाता है। सेवा संकल्प अभियान की सार्थकता इसी में है कि जरूरतमंदों को योजनाओं का लाभ दिलाने के साथ उन्हें सम्मानजनक व्यवहार और पारदर्शी व्यवस्था भी उपलब्ध हो।
