—Advertisement—

बैगाचक में 35 बच्चों की मौत का मामला गरमाया, बैगा समाज ने स्वास्थ्य तंत्र की जवाबदेही तय करने की मांग

एडीटर: Chetram Rajpoot September 15, 2026

—Advertisement—

– स्वास्थ्य, कुपोषण और जागरूकता की कमी के साथ सिस्टम की चूक को बताया जिम्मेदार; प्रभावित गांवों में पहुंचकर संगठन ने जुटाई जानकारी, शासन से मुआवजे और ठोस कार्रवाई की मांग

बालाघाट/डिंडौरी। बालाघाट जिले के बिरसा तहसील के सीमावर्ती एवं बैगा बाहुल्य बैगाचक क्षेत्र में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, कुपोषण और अन्य गंभीर बीमारियों के कारण कथित तौर पर 35 बच्चों की मृत्यु की घटना को लेकर बैगा आदिम जनजाति समाज विकास एवं कल्याण संगठन मध्यप्रदेश ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन के पदाधिकारियों ने प्रभावित क्षेत्र के विभिन्न गांवों में पहुंचकर जमीनी स्थिति की जानकारी ली और बच्चों की मौत से जुड़े कारणों तथा क्षेत्र में उपलब्ध स्वास्थ्य एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं की स्थिति को समझने का प्रयास किया।

संगठन के प्रतिनिधियों के अनुसार टीम ने ग्राम मछुरदा, मातला, धर्मशाला, कोरका, बोंदारी, कोड़केसा, पाथरी, गठिया सहित बैगाचक क्षेत्र के विभिन्न गांवों का दौरा किया। इस दौरान ग्रामीणों और प्रभावित परिवारों से जानकारी लेकर स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, आंगनवाड़ी संचालन और शिक्षा-जागरूकता से जुड़े विषयों की पड़ताल की गई।

– स्वास्थ्य सेवाओं और टीकाकरण व्यवस्था पर सवाल

संगठन का आरोप है कि दूरस्थ बैगा बस्तियों तक स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित पहुंच सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। कई क्षेत्रों में नजदीकी स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी अधिक होने के कारण ग्रामीणों को समय पर उपचार मिलना चुनौतीपूर्ण है। संगठन ने नर्स, आशा कार्यकर्ताओं तथा स्वास्थ्य विभाग के मैदानी अमले की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।

प्रतिनिधियों का कहना है कि कुछ स्थानों पर गर्भवती महिलाओं और बच्चों का समय पर टीकाकरण नहीं होने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की नियमित निगरानी में कमी की स्थिति सामने आई है। संगठन ने पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की भूमिका की गंभीरता से समीक्षा किए जाने की आवश्यकता बताई है।

– आंगनवाड़ी संचालन और पोषण व्यवस्था भी सवालों के घेरे में

बैगा समाज संगठन ने महिला एवं बाल विकास विभाग की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों में कुछ आंगनवाड़ी केंद्रों का नियमित संचालन नहीं होने और कार्यकर्ताओं एवं सहायिकाओं की भूमिका में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई देने की शिकायतें सामने आई हैं।

संगठन का कहना है कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं को पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना बेहद आवश्यक है। विशेष पिछड़ी जनजाति बहुल इन क्षेत्रों में आंगनवाड़ी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी एवं जवाबदेह बनाए जाने की जरूरत है।

– योजनाएं पहुंचीं, लेकिन कई जगह अब भी अधूरा है लाभ

संगठन के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि बैगाचक क्षेत्र में शासन की कई योजनाओं का लाभ पहुंचा है। सड़क और बिजली जैसी सुविधाएं कई क्षेत्रों में उपलब्ध हुई हैं, जबकि कुछ स्थानों पर पेयजल की समस्या अब भी बनी हुई है। प्रधानमंत्री जनमन योजना के अंतर्गत प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी अनेक परिवारों को मिला है, लेकिन कई परिवार अभी भी इसके लाभ से वंचित हैं।

संगठन के अनुसार पोषण आहार के लिए मिलने वाली 1500 रुपये की राशि भी कुछ पात्र हितग्राहियों को मिल रही है, जबकि कुछ मामलों में अभी लाभ शेष बताया गया है। संगठन ने कहा कि योजनाओं का लाभ स्वीकृत होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दूरस्थ बैगा बस्तियों तक उनका प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित होना जरूरी है।

– शिक्षा और जागरूकता की कमी को बताया बड़ी चुनौती

बैगा समाज संगठन ने बच्चों की मौत की घटना के संदर्भ में शिक्षा और जागरूकता की कमी को भी महत्वपूर्ण विषय बताया है। संगठन के अनुसार बैगाचक जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण, सरकारी योजनाओं और बच्चों की देखभाल से संबंधित जानकारी का अभी भी पर्याप्त प्रसार नहीं है।

संगठन का कहना है कि इन क्षेत्रों के लिए सामान्य जागरूकता अभियानों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेष एवं योजनाबद्ध जनजागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने की आवश्यकता है। ग्रामीण परिवारों को स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण, पोषण, गर्भवती महिलाओं की देखभाल और बच्चों में बीमारी के शुरुआती लक्षणों के संबंध में लगातार जागरूक किया जाना चाहिए।

– ‘सवाल दोहरे हैं—समाज में जागरूकता की कमी और सिस्टम की चूक’

संगठन ने इस पूरी घटना को केवल स्वास्थ्य व्यवस्था का विषय न मानते हुए व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बताया है। संगठन के प्रतिनिधियों के अनुसार एक ओर बैगा समाज में शिक्षा और जागरूकता की कमी है, वहीं दूसरी ओर दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी तंत्र की सेवाओं की पहुंच, नियमित निगरानी और मैदानी अमले की सक्रियता को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं।

संगठन का कहना है कि यदि दोनों पक्षों की कमियों को दूर नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना कठिन होगा। इसलिए तत्काल राहत के साथ-साथ दीर्घकालीन स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, पेयजल और जनजागरूकता की मजबूत व्यवस्था विकसित किए जाने की जरूरत है।

– शासन से मुआवजा और ठोस कदम उठाने की मांग

बैगा आदिम जनजाति समाज विकास एवं कल्याण संगठन ने घटना में मृत बच्चों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए शासन-प्रशासन से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता/मुआवजा तत्काल उपलब्ध कराने की मांग की है। संगठन ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नाम पत्राचार एवं ज्ञापन के माध्यम से भी अपनी मांगें शासन तक पहुंचाने की बात कही है।

संगठन ने मांग की है कि बच्चों की मृत्यु के कारणों की गंभीरता से जांच कराई जाए, प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए, नियमित टीकाकरण एवं स्वास्थ्य परीक्षण सुनिश्चित किया जाए तथा आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की सेवाओं की प्रभावी निगरानी की जाए। साथ ही दूरस्थ बैगा बस्तियों में विशेष स्वास्थ्य शिविर और व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की मांग की गई है।

– संगठन लगातार कर रहा जागरूकता का प्रयास

संगठन के पदाधिकारियों ने कहा कि घटना के बाद समाज के प्रतिनिधि प्रभावित क्षेत्रों और परिवारों के बीच लगातार पहुंचकर उन्हें स्वास्थ्य, पोषण और शासन की योजनाओं के प्रति जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। संगठन ने इसे केवल एक घटना तक सीमित न रखते हुए बैगा समाज के दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति सुधारने के लिए निरंतर सामाजिक प्रयास जारी रखने की बात कही है।

इस दौरान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष दलवीर सिंह धुर्वे, प्रदेश सह सचिव गुलाब सिंह मरावी, प्रदेश सदस्य मंगल सिंह पट्टा, जिला सचिव प्रभारी डिंडौरी महेंद्र धुर्वे, मीडिया प्रभारी डिंडौरी मंगल सिंह धुर्वे, जिला सदस्य अरविंद धुर्वे, बैसाखू खोहड़िया, बालाघाट जिला संयोजक चमरू सिंह चढ़चढ़िया, दुलेश बैगा, जिला अध्यक्ष अक्कल मरकाम, जिला सचिव देवलाल बैगा, सोनू बैगा सहित समाज के अन्य सदस्य मौजूद रहे।

संगठन ने मृत बच्चों के माता-पिता एवं परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए दिवंगत बच्चों को श्रद्धांजलि अर्पित की और शासन-प्रशासन से ऐसी घटना की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तत्काल एवं दीर्घकालीन प्रभावी कदम उठाने की मांग की।

 

एडीटर

Chetram Rajpoot

चेतराम राजपूत ‘मध्यभूमि के बोल’ के संपादक हैं और दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार के खुलासे और जमीनी खोजी पत्रकारिता के लिए उनकी पहचान है।...

Leave a Comment