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डिंडौरी के सरकारी स्कूलों में संस्था प्रमुखों का संकट, बगैर आदेश ‘स्वयंभू प्राचार्यों’ के भरोसे सैकड़ों स्कूल!

रिपोर्ट: Chetram Rajpoot August 20, 2026

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–  27 हायर सेकेंडरी और 43 हाईस्कूलों में आधिकारिक प्राचार्य नहीं होने का दावा, जवाबदेही तय नहीं होने से व्यवस्था पर उठ रहे सवाल

– अतिथि शिक्षक भर्ती से लेकर ग्रांट और लेखा संधारण तक अनियमितताओं की सुगबुगाहट

डिंडौरी न्यूज । शासन एक ओर सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने और शिक्षा के प्रति उनका रुझान बढ़ाने के लिए तमाम योजनाएं संचालित कर रहा है, वहीं आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी जिले में जनजातीय कार्य विभाग के अधीन संचालित सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि जिले के अनेक हाई एवं हायर सेकेंडरी स्कूलों में संस्था प्रमुख का पद रिक्त होने के बावजूद आधिकारिक रूप से प्राचार्य अथवा संस्था प्रमुख की जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। इसके चलते कथित तौर पर वरिष्ठ शिक्षक स्वयंभू संस्था प्रमुख के रूप में स्कूलों का संचालन कर रहे हैं।

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जिले में जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत 62 हायर सेकेंडरी स्कूल संचालित हैं। इनमें से 27 विद्यालयों में आधिकारिक आदेश के बगैर प्राचार्य के रूप में कार्य किए जाने की जानकारी सामने आ रही है। इसी तरह जिले में संचालित 66 हाईस्कूलों में से 43 स्कूलों में भी आधिकारिक तौर पर प्राचार्यों की नियुक्ति नहीं होने का दावा किया जा रहा है। यदि यह जानकारी सही है तो जिले की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में संस्था प्रमुखों की नियुक्ति और जवाबदेही का सवाल बेहद गंभीर हो जाता है।

– जवाबदेही तय नहीं तो स्कूलों में कौन जिम्मेदार?

स्कूल किसी भी व्यवस्था का संचालन संस्था प्रमुख की प्रशासनिक जिम्मेदारी के बिना सुचारू रूप से नहीं हो सकता। संस्था प्रमुख के अधिकार, दायित्व और वित्तीय जवाबदेही स्पष्ट होना आवश्यक है। लेकिन आरोप है कि जिन स्कूलों में आधिकारिक तौर पर प्राचार्य नियुक्त नहीं हैं, वहां वरिष्ठता के आधार पर कुछ शिक्षक स्वयं ही संस्था प्रमुख की भूमिका निभा रहे हैं।

ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि यदि स्कूल में प्रशासनिक अथवा वित्तीय स्तर पर कोई अनियमितता सामने आती है तो उसकी जवाबदेही किस अधिकारी या कर्मचारी की होगी? सूत्रों का आरोप है कि स्पष्ट आदेश और जवाबदेही के अभाव का फायदा उठाकर कई संस्थाओं में मनमानी की स्थिति बनी हुई है।

अतिथि शिक्षक भर्ती में भी ‘खेल’ के आरोप

सूत्रों के मुताबिक कुछ स्कूलों में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। आरोप है कि जिन विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं या जहां संबंधित पदों पर रिक्तियां नहीं हैं, वहां भी कथित तौर पर अतिथि शिक्षकों को नियुक्त किए जाने के प्रयास किए जाते हैं।

यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ संस्था प्रमुखों द्वारा नियम एवं प्रक्रिया को दरकिनार कर अपने परिचितों और सगे-संबंधियों को अतिथि शिक्षक के रूप में अवसर दिया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। यदि ऐसे मामलों में नियम विरुद्ध नियुक्तियां हुई हैं तो विभागीय स्तर पर इसकी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना जरूरी है।

अंशकालिक कर्मचारियों की नियुक्ति पर भी सवाल

स्कूलों में अंशकालिक कर्मचारियों सहित अन्य स्थानीय स्तर की नियुक्तियों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बजाय व्यक्तिगत पसंद और संबंधों के आधार पर नियुक्तियां की जा रही हैं।

शिक्षा व्यवस्था में यदि नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं रहती तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण पर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में विभाग को सभी विद्यालयों में की गई नियुक्तियों की प्रक्रिया और पात्रता की जांच कराने की आवश्यकता है।

– स्कूलों को मिलने वाली ग्रांट में भी अनियमितता के आरोप

सरकारी स्कूलों को मरम्मत, आवश्यक सामग्री की खरीदी, स्थानीय आवश्यकताओं और अन्य मदों के लिए मिलने वाली राशि के उपयोग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि कुछ संस्थाओं में कथित तौर पर फर्जी बिल-बाउचर के माध्यम से राशि के उपयोग का खेल किया जा रहा है।

यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली मूलभूत सुविधाओं पर भी सीधा असर पड़ेगा। ऐसे में प्रत्येक विद्यालय को जारी राशि, उसके खर्च और संबंधित बिल-बाउचर का स्वतंत्र ऑडिट या विभागीय जांच कराई जाना जरूरी है।

भगवान भरोसे लेखा संधारण!

जिले के सरकारी स्कूलों में लेखा संधारण व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार कई संस्थाओं में शासन से प्राप्त मरम्मत राशि, आवश्यक सामग्री क्रय और स्थानीय निधि सहित विभिन्न मदों में प्राप्त राशि के लेखे-जोखे को लेकर पारदर्शिता का अभाव है।

सवाल यह है कि विद्यालयों को मिलने वाली राशि का कितना हिस्सा वास्तव में विद्यार्थियों की सुविधाओं और स्कूल की जरूरतों पर खर्च हो रहा है और कितना कागजों में खर्च दिखाया जा रहा है? इसकी वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए स्कूलवार वित्तीय रिकॉर्ड, कैशबुक, बिल-बाउचर और उपयोगिता संबंधी दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।

– शासन की मंशा बनाम जमीनी हकीकत

एक ओर शासन सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर अधोसंरचना और विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए लगातार योजनाएं चला रहा है। दूसरी ओर यदि स्कूलों में संस्था प्रमुखों की आधिकारिक नियुक्ति नहीं होने, अतिथि शिक्षक भर्ती में नियमों की अनदेखी, ग्रांट के उपयोग और लेखा संधारण में कथित अनियमितताओं जैसी स्थिति बनी हुई है तो योजनाओं का वास्तविक लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचना मुश्किल है।

डिंडौरी जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले में सरकारी स्कूल बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की शिक्षा का आधार हैं। इसलिए संस्था प्रमुखों की नियुक्ति से लेकर वित्तीय और शैक्षणिक व्यवस्थाओं तक प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही तय होना जरूरी है।

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