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लोकायुक्त में बड़ा फेरबदल: स्टिंग ऑपरेशन के बाद 3 एसपी बदले, भ्रष्टाचार पर सवालों के बीच जारी हुए तबादला आदेश

एडीटर: Chetram Rajpoot June 5, 2026

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– ट्रैप मामलों को मैनेज करने के आरोपों से घिरे लोकायुक्त संगठन में प्रशासनिक बदलाव, भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

भोपाल। प्रदेश में भ्रष्टाचारियों और घूसखोर अधिकारियों पर कार्रवाई करने के लिए स्थापित विशेष पुलिस स्थापना (लोकायुक्त) इन दिनों स्वयं गंभीर सवालों के घेरे में है। इसी बीच लोकायुक्त संगठन में प्रशासनिक फेरबदल करते हुए तीन पुलिस अधीक्षकों (एसपी) की नवीन पदस्थापना के आदेश जारी किए गए हैं। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब हाल ही में सामने आए एक स्टिंग ऑपरेशन ने लोकायुक्त की कार्यप्रणाली और उसकी निष्पक्षता पर बहस छेड़ दी है। जारी आदेश के अनुसार एसपी दुर्गेश कुमार राठौर को भोपाल संभाग से सागर संभाग, एसपी योगेश्वर शर्मा को सागर से रीवा तथा एसपी सुनील पाटीदार को रीवा से भोपाल संभाग में पदस्थ किया गया है।

गौरतलब है कि लोकायुक्त का गठन भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और सरकारी तंत्र में व्याप्त अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से किया गया था। लेकिन हाल ही में सामने आए एक स्टिंग ऑपरेशन में लोकायुक्त संगठन के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों पर ट्रैप प्रकरणों को प्रभावित करने तथा मामलों को मैनेज करने के बदले लेन-देन के आरोप सामने आए हैं। स्टिंग में ड्राइवर से लेकर डीएसपी स्तर तक के अधिकारियों के नाम चर्चाओं में आने के बाद संगठन की साख पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कथित अनियमितताओं और प्रकरणों को कमजोर करने का खेल केवल निचले अथवा मध्य स्तर के अधिकारियों तक सीमित था, या फिर इसके तार उच्च पदस्थ अधिकारियों तक भी जुड़े हुए हैं। यदि आरोपों में तथ्य हैं तो यह केवल व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार विरोधी तंत्र के भीतर पनपे एक संगठित नेटवर्क का संकेत माना जाएगा।

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पिछले पांच वर्षों में लोकायुक्त द्वारा दर्ज ट्रैप मामलों, भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जांच, अंतिम प्रतिवेदन तथा अभियोजन संबंधी कार्यवाहियों की उच्च स्तरीय न्यायिक अथवा स्वतंत्र एजेंसी से समीक्षा कराई जानी चाहिए। ऐसी समीक्षा से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कितने मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई हुई और कितने मामलों में प्रभाव, दबाव अथवा कथित सौदेबाजी की भूमिका रही।

लोकायुक्त जैसी संस्था पर जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। ऐसे में केवल तबादलों से अधिक जरूरी यह माना जा रहा है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों की जवाबदेही तय की जाए और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने वाली संस्था की विश्वसनीयता पुनः स्थापित की जाए।

एडीटर

Chetram Rajpoot

चेतराम राजपूत ‘मध्यभूमि के बोल’ के संपादक हैं और दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। स्थानीय मुद्दों, भ्रष्टाचार के खुलासे और जमीनी खोजी पत्रकारिता के लिए उनकी पहचान है।...

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