– अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना पर केंद्र सरकार सख्त, आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर मांगी रिपोर्ट
डिंडौरी /मंडला। आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी एवं मंडला जिले में प्रस्तावित अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना अब राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनती जा रही है। जल-जंगल-जमीन और आदिवासी अधिकारों से जुड़े इस संवेदनशील मामले में अब भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) ने सीधे हस्तक्षेप करते हुए मध्यप्रदेश शासन से विस्तृत जांच और कार्रवाई रिपोर्ट तलब की है।
उक्त कार्रवाई जिला सरपंच संघ डिंडौरी के अध्यक्ष एवं आदिवासी नेता इंजी. फूल सिंह मरकाम द्वारा भेजे गए विस्तृत शिकायत के बाद हुई है। मंत्रालय ने 21 मई 2026 को जारी अपने आधिकारिक पत्र में मध्यप्रदेश शासन के आदिवासी विकास विभाग को निर्देशित किया है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए Forest Rights Act (FRA), PESA Act तथा RFCTLARR Act 2013 के तहत सभी वैधानिक पहलुओं की जांच कर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

– 22 आदिवासी गांव और 1 वन ग्राम पर डूब का खतरा
केंद्र सरकार जनजाति मंत्रालय के पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि अपर बुढ़नेर बांध सहित तीन प्रस्तावित परियोजनाओं के कारण मंडला-डिंडौरी क्षेत्र के 22 अनुसूचित जनजाति गांव और 1 वन ग्राम के जलमग्न होने की आशंका है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि प्रभावित ग्राम सभाओं की सहमति लिए बिना ही परियोजनाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है, जो संविधान प्रदत्त आदिवासी अधिकारों और कानूनों की मूल भावना के विपरीत है।
मंत्रालय ने अपने पत्र में कहा है कि चूंकि वन अधिकार अधिनियम का क्रियान्वयन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए। पत्र की प्रतिलिपि मंडला और डिंडोरी कलेक्टर को भी भेजी गई है, जिससे प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।
“यह सिर्फ बांध नहीं, आदिवासी अस्तित्व का सवाल”
इंजी. फूल सिंह मरकाम ने अपने प्रतिवेदन में कहा कि यह केवल एक विकास परियोजना का मामला नहीं बल्कि आदिवासी समाज के अस्तित्व, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सभाओं को विश्वास में लिए बिना परियोजनाओं को मंजूरी देने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, जो FRA और PESA कानूनों का खुला उल्लंघन है। मरकाम ने कहा कि यदि परियोजना इसी प्रकार लागू हुई तो हजारों आदिवासी परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन, जंगल, नदी, देवस्थलों और सांस्कृतिक विरासत से हमेशा के लिए बेदखल हो जाएंगे। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की है कि प्रभावित गांवों की ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को स्वीकृति न दी जाए।

– आदिवासी अंचल में बढ़ी हलचल, आंदोलन के संकेत
केंद्र सरकार द्वारा मामले में संज्ञान लिए जाने के बाद डिंडौरी और मंडला के प्रभावित क्षेत्रों में आंदोलन की चर्चाएं तेज हो गई हैं। कई ग्राम सभाओं, सामाजिक संगठनों और आदिवासी समुदायों ने इसे बड़ी जीत बताते हुए कहा है कि अब उनकी आवाज दिल्ली तक पहुंच चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जमीन और संस्कृति से अलग नहीं किया जा सकता। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि वर्षों से जल, जंगल और जमीन पर निर्भर समुदायों को विश्वास में लिए बिना योजनाएं बनाई जा रही हैं।
एक ग्रामीण ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा—
“पहले जंगल छीने गए, फिर जमीनें गईं, अब गांव डुबाने की तैयारी है। आदिवासी समाज अब चुप नहीं बैठेगा।”
– संवैधानिक अधिकारों पर बड़ा सवाल
जानकारों का मानना है कि अनुसूचित क्षेत्रों में किसी भी बड़ी परियोजना के लिए ग्राम सभा की अनुमति और स्थानीय समुदायों की सहमति अनिवार्य मानी जाती है। यदि बिना सहमति के परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है तो यह गंभीर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न बन सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार Forest Rights Act और PESA Act का उद्देश्य आदिवासी समुदायों को उनके पारंपरिक संसाधनों और अधिकारों की सुरक्षा प्रदान करना है। ऐसे में यदि नियमों की अनदेखी हुई है तो मामला न्यायिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ा विवाद खड़ा कर सकता है।
– दिल्ली तक पहुंची डिंडौरी की आवाज
अपर बुढ़नेर वृहद बांध परियोजना अब केवल एक निर्माण कार्य नहीं रह गई है, बल्कि यह जल-जंगल-जमीन, आदिवासी अस्मिता और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बनती जा रही है। डिंडोरी के आदिवासी अंचल से उठी यह आवाज अब दिल्ली के सत्ता गलियारों तक पहुंच चुकी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा प्रभाव डाल सकता है।










