डिंडौरी न्यूज।गोरखपुर कस्बा एवं आसपास के ग्रामीण अंचलों में किसानों के लोकपर्व छेरछेरा (छेरता) को शनिवार को पारंपरिक रीति-रिवाज और उत्साह के साथ मनाया गया। पौष पूर्णिमा के अवसर पर सुबह से ही बच्चों, युवाओं और युवतियों की टोलियां हाथों में टोकरी, बोरी और बर्तन लेकर घर-घर निकलीं। “छेरता कोठी के धान, हेरता…” की लोकधुन के साथ अन्नदान की मांग की गई, जिससे
पूरा गांव गूंज उठा
लोकपर्व को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों से धान, चावल, अनाज के साथ-साथ नगद राशि भी दान स्वरूप प्रदान की। बच्चों और युवाओं की टोली ने परंपरागत वेशभूषा में पूरे गांव का भ्रमण किया, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं द्वारा डंडा नृत्य का आकर्षक प्रदर्शन भी किया गया, जिसने पर्व की रौनक और बढ़ा दी।
गांव के बाहर बना सामूहिक प्रसाद
छेरछेरा पर्व के दौरान दान में प्राप्त अनाज को सभी टोलियों द्वारा गांव के बाहर एकांत स्थान पर ले जाकर खिचड़ी और खीर बनाई गई। इसके बाद इसे प्रसाद के रूप में ग्रामीणों में वितरित किया गया। कई घरों में आलू चॉप, भजिया सहित पारंपरिक व्यंजन भी बनाए गए। पर्व के चलते किसानों ने पूरे दिन खेती-किसानी का कार्य बंद रखकर इस लोकउत्सव को समर्पित किया।
वैवाहिक कार्यक्रमों की होती है शुरुआत
ग्राम के ब्रजेश कुशराम ने बताया कि छेरछेरा पर्व बच्चों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। वहीं पंडित महेश महाराज ने पर्व के धार्मिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पौष पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद माघ माह से वैवाहिक कार्यक्रमों की शुरुआत होती है। पौष माह में मान्यतानुसार विवाह जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं, इसलिए यह पर्व सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
छेरछेरा से जुड़ी मान्यताएं
छेरछेरा मुख्यतः किसानों का पर्व है, जो फसलों की कटाई और नई उपज से जुड़ा हुआ है। धान की फसल पकने और कोठी में अनाज भरने के बाद उसका कुछ हिस्सा दान में देने की प्राचीन परंपरा रही है। पूर्वजों की मान्यता है कि अन्नदान करने से घर में कभी अनाज की कमी नहीं होती। प्राचीन काल में रुपए-पैसे के स्थान पर धान का दान किया जाता था, जिसकी परंपरा आज भी किसी न किसी रूप में जीवित है।
इस पर्व का इतिहास भी रोचक माना जाता है। कहीं इसे राजाओं की कथाओं से जोड़ा जाता है, तो कहीं अकाल से बचाव या देवी-देवताओं के चमत्कार से। अलग-अलग क्षेत्रों में यह पर्व अलग नामों से मनाया जाता है, लेकिन उद्देश्य एक ही है—स्नेह, भाईचारा और सामूहिकता को मजबूत करना।
सामाजिक समरसता का प्रतीक
छेरछेरा पर्व के दौरान सभी वर्गों के लोग बिना भेदभाव के एक साथ भोजन करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। इससे समाज में आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारे की भावना प्रबल होती है। मान्यताओं और परंपराओं के साथ यह लोकपर्व आज भी ग्रामीण जीवन में हर्षोल्लास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बना हुआ है।









