– मध्यप्रदेश सरकार पर कर्ज़ का बढ़ता बोझ, 180 दिनों में ₹51 हजार करोड़ का ऋण; “मोदी की गारंटी” पर उठे सवाल
भोपाल। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश सरकार ने केवल 180 दिनों (अप्रैल से सितंबर 2025) में ₹51,000 करोड़ का नया कर्ज़ ले लिया है। इसका अर्थ है कि सरकार प्रतिदिन औसतन ₹284 करोड़ का ऋण उठा रही है। यह स्थिति वित्तीय अनुशासन के दावों पर सीधा सवाल खड़ा करती है।
वित्त विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच सरकार ने हर महीने औसतन ₹8,518 करोड़ का कर्ज़ लिया। यह राशि पूरे वित्तीय वर्ष 2024-25 में लिए गए कुल ₹31,000 करोड़ के ऋण से लगभग 64 प्रतिशत अधिक है। गौरतलब है कि 2025-26 के बजट में सरकार ने पूरे वर्ष के लिए ₹84,000 करोड़ ऋण लेने का लक्ष्य तय किया था, लेकिन मात्र छह महीनों में ही इस लक्ष्य का करीब 60 प्रतिशत ऋण ले लिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकेत देता है कि राज्य की वित्तीय व्यवस्था पर दबाव लगातार बढ़ रहा है और खर्चों पर नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है।

केंद्र से बकाया और बढ़ता दबाव
राज्य सरकार की इस बदहाल स्थिति के लिए केंद्र सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष मध्य प्रदेश को मिलने वाली करीब ₹12,000 करोड़ की राशि का भुगतान नहीं किया है, जो कुल देनदारी ₹45,000 करोड़ का लगभग 27 प्रतिशत है। आरोप है कि “डबल इंजन सरकार” का दावा करने के बावजूद केंद्र, भाजपा शासित राज्य को समय पर संसाधन उपलब्ध नहीं करा रही, जिससे राज्य को मजबूरन कर्ज़ का सहारा लेना पड़ रहा है।
कर्ज़ इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर, खर्च प्रचार पर
हाल के समाचारों के अनुसार, सरकार रिज़र्व बैंक और अन्य संस्थानों से इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के नाम पर ऋण ले रही है, लेकिन वास्तविक खर्च का बड़ा हिस्सा योजनाओं के प्रचार-प्रसार में हो रहा है। बीते छह महीनों में केवल प्रचार पर लगभग ₹450 करोड़ खर्च किए जाने की बात सामने आई है, जबकि जनसंपर्क विभाग का वार्षिक बजट ही ₹875 करोड़ है।
मंत्री का बयान भी चिंता बढ़ाने वाला
राज्य की बिगड़ती आर्थिक स्थिति की पुष्टि खुद शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के बयान से भी होती है। उन्होंने स्वीकार किया है कि चुनावी वादों, जिन्हें “मोदी की गारंटी” के रूप में प्रचारित किया गया, के कारण प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा है और इन घोषणाओं को पूरा करना अब चुनौतीपूर्ण हो गया है। उन्होंने इसके लिए केंद्र सरकार की अतिरिक्त सहायता की आवश्यकता भी जताई है।
बुनियादी क्षेत्रों में निवेश पर सवाल
नेता विपक्ष उमंग सिंगार का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों में अपेक्षित निवेश नहीं हो पा रहा है, जबकि बेरोज़गारी और आर्थिक असमानता लगातार बढ़ रही है। सरकार भले ही दो वर्षों की “उपलब्धियों” की लंबी सूची प्रस्तुत कर रही हो, लेकिन योजनाओं के ज़मीनी असर को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

इन तमाम मुद्दों को लेकर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने सोशल मीडिया पर भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री मोहन यादव पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने बढ़ते कर्ज़, वित्तीय कुप्रबंधन और अधूरे वादों को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश की वित्तीय स्थिति गंभीर दबाव में दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि क्या सरकार बढ़ते कर्ज़, अल्पकालिक योजनाओं और प्रचार से आगे बढ़कर टिकाऊ विकास और सुशासन की दिशा में ठोस कदम उठा पाएगी, या “मोदी की गारंटी” केवल एक नारा बनकर रह जाएगी।








