– समझौते से टूटते परिवार फिर जुड़े, वर्षों से लंबित विवादों को भी मिला समाधान — न्यायालयीन 373 और प्री-लिटिगेशन के 300 मामलों का हुआ निराकरण
डिंडौरी न्यूज । राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली एवं मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के निर्देशन तथा प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की अध्यक्ष श्रीमती शशिकांता वैश्य के मार्गदर्शन में शनिवार को जिला न्यायालय डिंडौरी, कुटुम्ब न्यायालय डिंडौरी एवं सिविल न्यायालय शहपुरा में नेशनल लोक अदालत का आयोजन किया गया। लोक अदालत में आपसी सहमति, सुलह और राजीनामे के माध्यम से कुल 673 प्रकरणों का निराकरण किया गया तथा 1 करोड़ 46 लाख 92 हजार 450 रुपये के अवार्ड पारित किए गए।
लोक अदालत के शुभारंभ अवसर पर कुटुम्ब न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश श्री एम.एल. राठौर एवं प्रथम जिला न्यायाधीश श्री डी.एस. मंडलोई ने मां सरस्वती के छायाचित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर प्रधान न्यायाधीश श्री एम.एल. राठौर ने कहा कि लोक अदालत आपसी सहमति और सुलह के माध्यम से विवादों के त्वरित, सरल एवं प्रभावी समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसमें पक्षकार बिना लंबे न्यायिक विवाद के आपसी समझौते से मामलों का समाधान कर सकते हैं।
– 373 लंबित मामलों में 1.24 करोड़ से अधिक के अवार्ड
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की सचिव एवं न्यायाधीश श्रीमती मुग्धा कुमार ने बताया कि नेशनल लोक अदालत में न्यायालयों में लंबित 373 प्रकरणों का निराकरण किया गया। इन मामलों में कुल 1 करोड़ 24 लाख 24 हजार 595 रुपये राशि के अवार्ड पारित किए गए।
वहीं प्री-लिटिगेशन प्रकरणों की श्रेणी में 300 मामलों का निराकरण हुआ और संबंधित विभागों को 22 लाख 67 हजार 855 रुपये की राशि प्राप्त हुई। इस प्रकार न्यायालयों में लंबित तथा प्री-लिटिगेशन सहित कुल 673 प्रकरणों का निराकरण करते हुए 1 करोड़ 46 लाख 92 हजार 450 रुपये के अवार्ड पारित किए गए।
लोक अदालत में लंबित पारिवारिक विवादों के साथ मोटरयान दुर्घटना दावा प्रकरण, चेक अनादरण के मामले तथा विभिन्न राजीनामा योग्य आपराधिक एवं दीवानी प्रकरणों का आपसी समझौते के आधार पर निराकरण किया गया। इसके अतिरिक्त बैंकों की ऋण वसूली, विद्युत एवं दूरभाष बिलों की बकाया राशि तथा नगर पालिका के संपत्ति कर एवं जलकर से जुड़े प्री-लिटिगेशन मामलों को भी पक्षकारों की सहमति से सुलझाया गया।
12 साल से अलग रह रहे पति-पत्नी फिर साथ आए
इस लोक अदालत की खास उपलब्धियों में पारिवारिक विवादों का समझौते के माध्यम से समाधान भी रहा। कुटुम्ब न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश श्री एम.एल. राठौर द्वारा समझाइश दिए जाने के बाद एक पति अपनी 12 वर्षों से विवाहित पत्नी और दो बच्चों के साथ वापस घर लौटने के लिए सहमत हुआ। इससे वर्षों से अलग चल रहा परिवार फिर से एकजुट हो सका।
इसी प्रकार न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी श्रीमती कमला उईके ने समझाइश एवं आपसी सहमति के माध्यम से वर्ष 2015 से अलग रह रहे पति-पत्नी के बीच चल रहे विवाद का समाधान कराया। दोनों पक्षों की सहमति से विवाद समाप्त होने के साथ ही उनके बीच संबंधों को पुनः बेहतर बनाने का रास्ता भी खुला।

भाई-भाई और भाई-बहन के विवाद भी सुलझे
लोक अदालत में केवल आर्थिक एवं न्यायिक विवाद ही नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों से जुड़े मामलों का भी समाधान हुआ। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी श्री अतुल श्रीवास्तव, डिंडौरी तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी श्री कर्नल सिंह श्याम, शहपुरा के न्यायालय में आपसी राजीनामे के माध्यम से एक भाई-भाई तथा एक भाई-बहन के बीच चल रहे विवादों का निराकरण किया गया। समझौते के बाद संबंधित प्रकरण समाप्त कर दिए गए।
इस तरह लोक अदालत ने लंबित मामलों को समाप्त करने के साथ ही पारिवारिक रिश्तों में आई दूरियों को कम करने और पक्षकारों के बीच आपसी सौहार्द कायम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी रहे मौजूद
कार्यक्रम में द्वितीय जिला न्यायाधीश श्री शिवकुमार कौशल, तृतीय जिला न्यायाधीश श्री रविंद्र गुप्ता, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री गिरजेश कुमार सनौडिया, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी श्रीमती कमला उईके, श्री आर.पी. सिंह, श्री अतुल श्रीवास्तव, श्रीमती रिया डेहरिया एवं सुश्री अदिति सनौडिया, जिला विधिक सहायता अधिकारी श्रीमती दीपिका तारन, एडीएम श्री जे.पी. यादव, एसडीओपी श्री सतीश द्विवेदी, एएसपी श्रीमती रेखा सिंह, अधिवक्ता संघ अध्यक्ष श्री यू.के. पटेरिया, कर्मचारी संघ अध्यक्ष श्री भीम प्रकाश रामटेके सहित डिफेंस काउंसिल टीम, अधिवक्तागण, न्यायालयीन कर्मचारी, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के कर्मचारी, पक्षकार तथा विद्युत विभाग, नगरपालिका एवं विभिन्न बैंकों के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।
लोक अदालत के परिणामों से यह स्पष्ट हुआ कि आपसी सहमति और सुलह के माध्यम से न केवल वर्षों से लंबित न्यायिक विवादों को समाप्त किया जा सकता है, बल्कि टूटते पारिवारिक रिश्तों को भी दोबारा जोड़ने का प्रभावी प्रयास किया जा सकता है।
